#794 गुमनाम थे वह, गुमनाम थे हम ; कुछ थी हकिकते , कुछ थे खूबसूरत ख्…
- Posted
- 2020-10-02
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#794 गुमनाम थे वह, गुमनाम थे हम ; कुछ थी हकिकते , कुछ थे खूबसूरत ख्वाब; फासले थे दरमियाँ कई, गलत फैमीलीया भी थी कई; क्या करे हम अब बताओ यारो, बिना पते के यह खत कैसे भैजे वह भी बता जरा यारो; कम से कम यह कश्मकश की आंधी तोह उससे बुझ जायेगी ना यारो! ~संकेत #2:10:2020::11:24:pm
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